कोरकू समुदाय
पाठ्यक्रम: GS1/जनजातीय समूह
संदर्भ
- मध्य प्रदेश के स्वदेशी कोरकू समुदाय ने वन विभाग एवं जिला प्रशासन से वन भूमि पर हुए अतिक्रमण को हटाने की मांग की है।
परिचय
- कोरकू एक मुंडा जनजातीय समुदाय है, जिसका प्रमुख निवास मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र के कुछ भागों में है।
- वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार कोरकू समुदाय की कुल जनसंख्या 4,52,149 थी।
- ‘कोरकू’ का शाब्दिक अर्थ ‘मानव समूह’ है।
- यह समुदाय मुंडा भाषा-समूह से संबंधित कोरकू भाषा बोलता है, जो मोन-ख्मेर भाषा परिवार का भाग है।
- पूर्वजों की पूजा इस समुदाय की एक प्रमुख विशेषता है। मृतकों की स्मृति में ‘मुंडा’ नामक स्मृति-स्तंभ स्थापित किए जाते हैं।
- इनके पारंपरिक नृत्य एवं उत्सव कृषि तथा वनों से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं।
स्रोत: DTE
राष्ट्रीय सम्मान के अपमान का निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026
पाठ्यक्रम: GS2/शासन व्यवस्था
समाचार में
- सरकार संसद के मानसून सत्र के दौरान राष्ट्रीय सम्मान के अपमान का निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 प्रस्तुत कर सकती है।
परिचय
- राष्ट्रीय सम्मान के अपमान का निवारण अधिनियम, 1971 वर्तमान में राष्ट्रीय ध्वज, भारत का संविधान तथा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को विधिक संरक्षण प्रदान करता है।
- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की है, जिसके अंतर्गत ‘वन्दे मातरम्’ का जानबूझकर अपमान करना अथवा उसके गायन में बाधा उत्पन्न करना दंडनीय अपराध बनाया जाएगा।
- प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, जो कोई भी जानबूझकर ‘वन्दे मातरम्’ का अपमान करेगा, उसके गायन को रोकेगा अथवा उसमें व्यवधान उत्पन्न करेगा, उसे अधिकतम तीन वर्ष के कारावास, या जुर्माना, अथवा दोनों से दंडित किया जाएगा। यह दंड राष्ट्रगान से संबंधित समान अपराधों के लिए निर्धारित दंड के समान होगा।
वन्दे मातरम्
- ‘वन्दे मातरम्’ का अर्थ है — “हे मातृभूमि! मैं आपको नमन करता हूँ।”
- इसकी रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी तथा यह प्रथम बार 7 नवम्बर, 1875 को ‘बंगदर्शन’ पत्रिका में प्रकाशित हुई।
- बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनन्दमठ’ (1882) में सम्मिलित किया गया तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे संगीतबद्ध किया।
- यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद एवं स्वतंत्रता संग्राम का एक सशक्त प्रतीक बना। इसने 1905 के स्वदेशी आंदोलन सहित अनेक आंदोलनों को प्रेरित किया तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जन-आह्वान का माध्यम बना।
- मैडम भीकाजी कामा ने वर्ष 1907 में विदेश में फहराए गए प्रथम भारतीय तिरंगे पर ‘वन्दे मातरम्’ अंकित कराया था। अनेक क्रांतिकारियों, जिनमें मदन लाल ढींगरा भी शामिल थे, ने इसे देशभक्ति के उद्घोष के रूप में अपनाया।
- 24 जनवरी, 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में घोषणा की कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा तथा ‘वन्दे मातरम्’ को स्वतंत्रता संग्राम में उसके ऐतिहासिक योगदान के कारण राष्ट्रीय गीत के रूप में समान सम्मान दिया जाएगा।
- 7 नवम्बर, 2025 को ‘वन्दे मातरम्’ ने अपनी रचना के 150 वर्ष पूर्ण किए। यह आज भी राष्ट्रीय एकता, देशभक्ति, त्याग तथा राष्ट्रीय पहचान का कालजयी प्रतीक है।
स्रोत: TH
कुडनकुलम परमाणु विद्युत परियोजना
पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा
संदर्भ
- एक दुष्ट-संगणक सॉफ़्टवेयर (रैनसमवेयर) समूह ने कुडनकुलम परमाणु विद्युत परियोजना से संबंधित कुछ अभिलेखों को गुप्त इंटरनेट मंच पर सार्वजनिक किया है।
परिचय
- कुडनकुलम परमाणु विद्युत परियोजना तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित है।
- यह भारत का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत उत्पादन केंद्र है।
- इसमें दाबित जल रिएक्टर प्रौद्योगिकी पर आधारित छह परमाणु रिएक्टर इकाइयाँ स्थापित की जा रही हैं, जिनका विकास रूस के तकनीकी सहयोग से किया गया है।
- प्रथम दो इकाइयाँ पहले से ही संचालित हैं।
- तीसरी एवं चौथी इकाइयाँ निर्माणाधीन हैं और वर्ष 2027 तक उनके चालू होने की संभावना है।
- शेष दो इकाइयाँ विभिन्न चरणों में प्रगति पर हैं।
भारत में परमाणु ऊर्जा
- वर्तमान में भारत में सात स्थलों पर 24 परमाणु ऊर्जा रिएक्टर संचालित हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 8.78 गीगावाट है।
- अन्य प्रमुख परमाणु विद्युत केंद्र हैं—
- तारापुर परमाणु विद्युत केंद्र (महाराष्ट्र)
- राजस्थान परमाणु विद्युत केंद्र
- कैगा परमाणु विद्युत केंद्र (कर्नाटक)
- मद्रास परमाणु विद्युत केंद्र (तमिलनाडु)
- नरोरा परमाणु विद्युत केंद्र (उत्तर प्रदेश)
- काकरापार परमाणु विद्युत केंद्र (गुजरात)
- इसके अतिरिक्त दस नई परमाणु रिएक्टर इकाइयाँ, जिनकी संयुक्त क्षमता 8,000 मेगावाट है, निर्माणाधीन हैं।
- इन परियोजनाओं में दाबित भारी जल रिएक्टर, उबलते जल रिएक्टर तथा हल्के जल रिएक्टर प्रौद्योगिकियों का उपयोग किया जा रहा है।
- भारत मुख्यतः प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन का उपयोग दाबित भारी जल रिएक्टरों के संचालन तथा परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए करता है।
स्रोत: TH
साइक्लोस्पोरियासिस(Cyclosporiasis) प्रकोप
पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य; GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- संयुक्त राज्य अमेरिका में साइक्लोस्पोरियासिस रोग का बढ़ता प्रकोप जनस्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन गया है।
परिचय
- साइक्लोस्पोरियासिस एक प्रकार का खाद्यजनित विषाक्त संक्रमण है, जो साइक्लोस्पोरा कायेटानेन्सिस नामक सूक्ष्म परजीवी के कारण होता है।
- यह सामान्यतः दूषित ताज़ी खाद्य उपज, जैसे—हरी पत्तेदार सब्जियाँ, सलाद पत्ता, पालक, तुलसी, धनिया, अजमोद, रसभरी तथा स्नो मटर के सेवन से जुड़ा होता है।
- यह रोग मल-मुख मार्ग से फैलता है, अर्थात् परजीवी युक्त मल से दूषित भोजन अथवा जल के सेवन से संक्रमण होता है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता।
- यद्यपि इस रोग का प्रथम प्रकाशित मानव मामला वर्ष 1979 में पापुआ न्यू गिनी में दर्ज किया गया था, किंतु 1990 के दशक में खाद्यजनित अनेक प्रकोपों के बाद ही इसे मानवों में एक महत्त्वपूर्ण रोगजनक के रूप में व्यापक मान्यता मिली।
- संक्रमण के लगभग एक सप्ताह बाद इसके लक्षण प्रकट होते हैं, जिनमें—
- जल जैसे दस्त,
- पेट में ऐंठन,
- पेट फूलना,
- भूख में कमी,
- अत्यधिक थकान,
- मतली,
- शरीर के भार में कमी,
- कभी-कभी उल्टी तथा
- हल्का ज्वर शामिल हैं।
- सामान्यतः यह रोग जीवन के लिए घातक नहीं होता, किंतु बच्चों, वृद्ध व्यक्तियों तथा कमजोर प्रतिरक्षा तंत्र वाले लोगों में यह अधिक गंभीर हो सकता है।
- इसके उपचार हेतु ट्राइमेथोप्रिम–सल्फामेथॉक्साज़ोल प्रतिजैविक औषधि की अनुशंसा की जाती है। साथ ही, शरीर में जल की कमी से बचाव के लिए पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन आवश्यक होता है।
स्रोत: TH
संशोधित निगमीय औसत ईंधन दक्षता (तृतीय चरण) मानदंड
पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
समाचार में
- हाल ही में केंद्र सरकार ने निगमीय औसत ईंधन दक्षता (तृतीय चरण) मानदंडों का प्रारूप सार्वजनिक परामर्श हेतु जारी किया है। इन मानदंडों के अंतर्गत 1 अप्रैल, 2027 से यात्री वाहनों की ईंधन दक्षता तथा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए अधिक कठोर मानक लागू किए जाने का प्रस्ताव है।
पृष्ठभूमि
- ऊर्जा दक्षता ब्यूरो ने वर्ष 2017 में यात्री वाहनों की ईंधन खपत तथा कार्बन उत्सर्जन को विनियमित करने के उद्देश्य से निगमीय औसत ईंधन दक्षता मानदंड लागू किए थे।
- ये मानदंड पेट्रोल, डीज़ल, द्रवीकृत पेट्रोलियम गैस, संपीड़ित प्राकृतिक गैस, संकर वाहन तथा विद्युत चालित वाहन, जिनका भार 3,500 किलोग्राम से कम है, पर लागू होते हैं।
- वित्तीय वर्ष 2022–23 के प्रारंभ में इन मानदंडों को और अधिक कठोर बनाया गया तथा अनुपालन न करने पर दंड में वृद्धि की गई।
- इन मानदंडों का उद्देश्य वाहन निर्माताओं को कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाने के लिए प्रेरित करना तथा विद्युत, संकर एवं संपीड़ित प्राकृतिक गैस आधारित वाहनों के निर्माण को बढ़ावा देना है, क्योंकि ये जीवाश्म ईंधन आधारित वाहनों की तुलना में कम कार्बन उत्सर्जित करते हैं।
संशोधित निगमीय औसत ईंधन दक्षता (तृतीय चरण) मानदंडों की प्रमुख विशेषताएँ
- अधिक महत्वाकांक्षी ईंधन दक्षता लक्ष्य: प्रस्तावित मानदंडों के अनुसार वाहन निर्माताओं को अपने सम्पूर्ण वाहन समूह की ईंधन दक्षता में क्रमिक सुधार करना होगा।
- लक्ष्य ईंधन खपत को वर्ष 2027–28 में प्रति 100 किलोमीटर 3.996 लीटर (प्रति किलोमीटर 94.76 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड) से घटाकर वर्ष 2031–32 तक प्रति 100 किलोमीटर 3.327 लीटर (प्रति किलोमीटर 78.90 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड) करने का प्रस्ताव है।
- जैव ईंधनों को मान्यता: प्रथम बार कार्बन तटस्थता गुणांक लागू करने का प्रस्ताव किया गया है।
- इसके अंतर्गत एथेनॉल, संपीड़ित जैव गैस तथा अन्य जैव ईंधनों का उपयोग करने वाले वाहनों के लिए वास्तविक निकास उत्सर्जन से कम उत्सर्जन का दावा करने की अनुमति होगी, क्योंकि इनका समग्र जीवन-चक्र उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम होता है।
- चरणबद्ध अनुपालन व्यवस्था: अब वार्षिक अनुपालन के स्थान पर वाहन निर्माताओं का मूल्यांकन दो अनुपालन अवधियों में किया जाएगा—
- पहली अवधि तीन वर्ष की तथा
- दूसरी अवधि दो वर्ष की होगी।
- प्रौद्योगिकी आधारित प्रोत्साहन: ईंधन की बचत करने वाली प्रौद्योगिकियों को अपनाने वाले वाहन निर्माताओं के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहनों का प्रस्ताव किया गया है।
- उन्हें प्रति किलोमीटर 9 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड तक अनुपालन लाभ का दावा करने की अनुमति होगी, किंतु प्रत्येक स्वीकृत प्रौद्योगिकी पर अधिकतम प्रति किलोमीटर 1 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का लाभ ही प्राप्त होगा।
- स्वच्छ वाहनों के लिए विशेष प्रोत्साहन: संशोधित मानदंडों में बैटरी चालित विद्युत वाहन, परास-विस्तारित विद्युत वाहन, बाह्य विद्युत आपूर्ति से आवेशित संकर वाहन, पूर्ण संकर वाहन तथा बहु-ईंधन वाहन के लिए विशेष प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव किया गया है।
- इन वाहनों को औसत ईंधन खपत की गणना में अतिरिक्त लाभ प्रदान किया जाएगा, जिससे स्वच्छ वाहन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा मिलेगा।
स्रोत: PIB
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संक्षिप्त समाचार 17-07-2026